अभिनेत्री ऋचा चड्ढा, जिन्होंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से लेकर ‘मसान’ तक अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है, हाल ही में मातृत्व के बाद काम पर लौटने के अपने अनुभवों को लेकर खुलकर सामने आई हैं। मां बनने की ख़ुशी और नई ज़िम्मेदारियाँ जहां एक तरफ उनके जीवन को एक नया आयाम दे रही थीं, वहीं दूसरी ओर उन्हें बॉलीवुड इंडस्ट्री के कुछ कड़वे और निराशाजनक सच का भी सामना करना पड़ा।
मां बनने के बाद आए बदलाव और काम से दूरी
बेटी के जन्म के बाद ऋचा चड्ढा ने लगभग दो साल तक काम से ब्रेक लिया। मातृत्व एक ऐसा पड़ाव है जो हर महिला के जीवन को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से बदल देता है। इस दौरान हर माँ को अपने शरीर और मन को फिर से काम के लिए तैयार करने में समय लगता है। ऋचा ने भी अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में इस बात को ज़ाहिर किया कि काम पर लौटने की इच्छा तो है, लेकिन शरीर और मन तुरंत तैयार नहीं हो पाए हैं।
दो साल के ब्रेक के बाद जब ऋचा काम पर लौटीं, तो उन्हें इंडस्ट्री के कुछ ऐसे लोगों से कड़वे अनुभव मिले, जिन्हें उन्होंने ‘प्रोफेशनल धोखा’ नाम दिया है। उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्हें एहसास हुआ कि इंडस्ट्री में काम के एथिक्स की कितनी कमी है।
ऋचा ने ज़ाहिर किया कि उन्हें कुछ लोगों से ‘नफ़रत’ मिली। उनका मानना है कि कई लोग अपने अंदरूनी ‘इनफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स’ से जूझ रहे हैं और दूसरों के लिए खुशी नहीं चाहते, इसलिए वे हर तरफ सिर्फ़ दुख और नकारात्मकता फैलाते हैं।
उन्होंने यहाँ तक कहा कि कुछ लोगों का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है, वे खुद खुश नहीं रहते, और इसी वजह से दूसरों को भी परेशान करते हैं। इस ‘धोखे’ में शायद काम के वादों से मुकरना, आखरी मौके पर प्रोजेक्ट से बाहर कर देना, या मातृत्व के कारण उन्हें कमजोर मानकर कम आंकना शामिल हो सकता है। यह उस पितृसत्तात्मक सोच को भी दर्शाता है जो अक्सर काम पर लौटने वाली माँओं को संदेह की नज़र से देखती है।
ऋचा ने सोशल मीडिया की लगातार कंटेंट बनाने और खुद को ‘बेचने’ की संस्कृति पर भी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हर कोई उन्हें सोशल मीडिया पर अधिक पोस्ट करने, ज़्यादा कॉन्टेंट बनाने के लिए कहता है, लेकिन सोशल मीडिया उन्हें रोजगार नहीं दे रहा है। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा, “मैं बिकाऊ नहीं हूँ।” वह अपनी निजी ज़िंदगी की छोटी-छोटी बातें भी सार्वजनिक करने से कतराती हैं, जो एक पब्लिक फिगर के लिए एक बड़ा संघर्ष है।
अपने अनुभवों को साझा करते हुए, ऋचा ने एक शक्तिशाली संदेश दिया है कि वह उन लोगों को ‘माफ़’ तो कर देंगी, लेकिन कभी ‘भूलेंगी नहीं’। यह वाक्य उनके अंदर की मज़बूती और स्वाभिमान को दर्शाता है।
ऋचा चड्ढा की यह दास्तान सिर्फ़ उनकी व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि यह उस चुनौती को सामने लाती है जिसका सामना अक्सर कामकाजी माँओं को, खासकर ग्लैमर इंडस्ट्री में, करना पड़ता है। यह दिखाता है कि एक महिला का करियर ब्रेक, चाहे वह मातृत्व के लिए ही क्यों न हो, कभी-कभी प्रोफेशनल रिश्तों में कड़वाहट और धोखे का कारण बन जाता है।
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