अगर आप 90 के दशक के बच्चे हैं, तो ‘बूगी वूगी’ आपके लिए सिर्फ एक टीवी शो नहीं, बल्कि एक जज्बात था। जावेद जाफ़री, जिन्होंने भारत में डांस को एक नई पहचान दी, आज के डांस रियलिटी शोज की चमक-धमक से बहुत खुश नहीं हैं। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कहीं, जिन्होंने टीवी इंडस्ट्री और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
जावेद जाफ़री का सबसे बड़ा दर्द यह है कि आज के सभी डांस शोज “एक जैसे” नजर आते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही शोज के नाम और फॉर्मेट बदल गए हों, लेकिन उनकी आत्मा और पेश करने का तरीका बिल्कुल एक जैसा हो गया है।
उनके अनुसार, आज के शोज में टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन ओरिजिनलिटी (मौलिकता) की भारी कमी है।
उन्होंने बताया आज लगभग हर कंटेस्टेंट के साथ एक “दुख भरी कहानी” जोड़ी जाती है ताकि दर्शकों की सहानुभूति बटोरी जा सके। आजकल के डांसर्स इंटरनेट पर ग्लोबल स्टाइल देखकर उन्हें कॉपी कर रहे हैं। इसकी वजह से उनकी अपनी कोई अलग पहचान या ‘सिग्नेचर स्टाइल’ नजर नहीं आता।
डांस अब कला कम और जिमनास्टिक ज्यादा लगने लगा है। हर परफॉरमेंस में फ्लिप और स्टंट्स की भरमार होती है, जिससे डांस का असली सुकून और ग्रेस कहीं खो जाता है।
जावेद जाफ़री ने याद दिलाया कि ‘बूगी वूगी’ क्यों खास था। वह किसी विदेशी शो की नकल नहीं था, बल्कि पूरी तरह से भारतीय सोच पर आधारित था। उस दौर में कंटेस्टेंट्स की कहानियां पहले से तय नहीं होती थीं। जो कुछ भी होता था, वह स्वाभाविक होता था।
शो का बजट कम था (शुरुआत सिर्फ 14 लाख से हुई थी), लेकिन उसका फोकस सिर्फ और सिर्फ डांस पर था। वहां सिर्फ प्रोफेशनल डांसर्स नहीं, बल्कि बच्चे, मम्मी-पापा और बुजुर्ग भी अपनी खुशी के लिए नाचते थे।
जावेद का मानना है कि आज की प्रोडक्शन टीमें TRP के पीछे इतनी अंधी हो गई हैं कि वे डांस की बारीकियों को भूल गई हैं। जब हर तरफ तार से लटके हुए लोग और बैकग्राउंड में बजता तेज म्यूजिक ही दिखाई दे, तो डांस की लय दब जाती है।
उन्होंने कहा, “भगवान दादा का डांस सादा था, लेकिन उसमें एक लय थी। डांस तकनीकी होने से ज्यादा दिल से होना जरूरी है।”
जावेद जाफ़री की ये बातें कड़वी जरूर हैं, लेकिन सच के बेहद करीब हैं। उनका कहना है कि अगर कभी ‘बूगी वूगी’ जैसा शो वापस आता है, तो उसे एक नई सोच के साथ आना होगा। वह पुराने ढर्रे या आज के “कॉपी-पेस्ट” वाले फॉर्मेट में फिट नहीं बैठना चाहते।
अंत में, जावेद हमें याद दिलाते हैं कि डांस मनोरंजन के साथ-साथ एक अभिव्यक्ति (एक्सप्रेशन) भी है। अगर सब कुछ एक जैसा दिखने लगेगा, तो वह कला नहीं, सिर्फ एक मशीनरी बनकर रह जाएगी।
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