हुमा कुरैशी, जो बॉलीवुड की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक हैं, उन्होंने एक इंटरव्यू में पैपराज़ी कल्चर को लेकर एक बहुत ही मज़ेदार और सच बात कही थी। उन्होंने इस ‘स्पॉटिंग’ के खेल का एक ऐसा पहलू उजागर किया था जिसके बारे में सब जानते हैं, लेकिन कोई खुलकर बात नहीं करता।
हुमा का बेबाक बयान
हुमा ने पैपराज़ी की इस पूरी व्यवस्था के बारे में बहुत ही साफ़गोई से बताया कि यह सब अचानक नहीं होता, बल्कि ‘जब हमें स्पॉट होना होता है, तब हम उन्हें बुलाते हैं।’ उनका यह बयान बॉलीवुड की ग्लैमरस दुनिया की एक बड़ी सच्चाई को सबके सामने ले आया।
यह एक आम धारणा है कि जब कोई सेलेब्रिटी एयरपोर्ट, जिम, या किसी कैफ़े में स्पॉट होता है, तो वह महज़ एक इत्तेफ़ाक होता है। लेकिन हुमा के मुताबिक, कई बार यह सब एक सुनियोजित (well-planned) PR एक्टिविटी होती है।
जब किसी सेलेब्रिटी की फ़िल्म आने वाली होती है, या वह लंबे समय से लाइमलाइट से दूर होता है, तो ‘स्पॉट’ होकर वह फिर से लोगों के ज़ेहन में आ जाता है। उनका लुक, उनका स्टाइल, उनके कपड़े – ये सब कैमरे में कैद होते हैं और उनकी इमेज बिल्डिंग में मदद करते हैं।
कई बार किसी ख़ास इवेंट या किसी नए प्रोजेक्ट की ओर ध्यान खींचने के लिए भी यह किया जाता है। पैपराज़ी की रोज़ी-रोटी इन तस्वीरों और वीडियो पर टिकी होती है, जो मीडिया हाउसेस को बेचे जाते हैं। सेलेब्रिटी की तस्वीरें सोशल मीडिया और ऑनलाइन पोर्टल्स पर लाखों व्यूज लाती हैं।
हुमा का बयान यह नहीं कहता कि हर बार स्पॉटिंग नकली होती है। ऐसे भी कई मौके होते हैं जब पैपराज़ी सच में सेलेब्रिटी का पीछा करते हैं और उन्हें अचानक कैप्चर कर लेते हैं। लेकिन उनका इशारा उन मौकों की ओर था जहाँ सेलेब्रिटी की ओर से ‘सहूलियत’ दी जाती है या यहाँ तक कि उन्हें ‘सूचना’ दी जाती है कि वे कहाँ होंगे।
हुमा कुरैशी ने इस बात को सबके सामने लाकर एक ईमानदार बातचीत की शुरुआत की है। उन्होंने दिखाया कि कैमरे के पीछे की दुनिया अक्सर वैसी नहीं होती जैसी दिखाई देती है। ‘स्पॉट’ होने का यह खेल महज़ किस्मत या इत्तेफ़ाक का नहीं, बल्कि कई बार एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होता है।
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