बॉलीवुड की वर्सेटाइल अभिनेत्री दिव्या दत्ता अक्सर अपनी संजीदा अदाकारी के लिए जानी जाती हैं, लेकिन कुछ फिल्में उनके दिल के बेहद करीब होती हैं। हाल ही में एक भावुक पोस्ट और इंटरव्यू के जरिए दिव्या ने साल 2011 में आई फिल्म ‘स्टेनली का डब्बा’ की शूटिंग के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे बिना किसी चकाचौंध और तामझाम के एक बेहतरीन सिनेमा का जन्म हुआ।
जब 5वीं क्लास की किताब बनी फिल्म की ‘स्क्रिप्ट’
दिव्या दत्ता ने एक दिलचस्प खुलासा करते हुए बताया कि उनके पास इस फिल्म के लिए कोई पारंपरिक भारी-भरकम स्क्रिप्ट नहीं थी। उनके किरदार ‘रोजी मिस’ के लिए मुख्य संदर्भ सामग्री केवल 5वीं कक्षा की अंग्रेजी की पाठ्यपुस्तक थी। दिव्या ने कहा, “सेट पर जो कुछ भी हुआ, वह एकदम सहज था। मेरे पास कोई रटे-रटाए डायलॉग्स नहीं थे, मुझे बस उन बच्चों के साथ क्लास में रहना था और उनकी मासूमियत पर प्रतिक्रिया देनी थी।”
‘नो वैनिटी, नो स्टाफ’: सादगी से भरा था सेट
आज के दौर में जहां छोटे से सीन के लिए भी एक्टर्स के साथ बड़ा स्टाफ और वैनिटी वैन होती है, दिव्या ने बताया कि ‘स्टेनली का डब्बा’ के सेट पर ऐसा कुछ भी नहीं था।
टिफिन शेयरिंग: शूटिंग के दौरान ब्रेक में कोई अलग कमरा या लग्जरी खाना नहीं होता था। सभी कलाकार और बच्चे एक ही क्लासरूम में बैठकर अपना-अपना टिफिन शेयर करते थे।
असली जुड़ाव: दिव्या के अनुसार, फिल्म की असली जान वह ‘टिफिन शेयरिंग’ ही थी जिसने परदे पर दिखने वाली केमिस्ट्री को इतना वास्तविक बनाया।
एक भीड़भाड़ वाले थिएटर में मिला था फिल्म का ऑफर
फिल्म मिलने की कहानी भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं है। दिव्या ने याद किया कि डायरेक्टर अमोल गुप्ते ने उन्हें यह फिल्म तब ऑफर की थी, जब वे दोनों एक भीड़भाड़ वाले सिनेमा हॉल में खड़े होकर एक बच्चों की फिल्म के ‘एंड क्रेडिट्स’ देख रहे थे। वहीं खड़े-खड़े फिल्म की नींव पड़ी और एक ऐसी कहानी सामने आई जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
बच्चों के साथ का अनुभव
दिव्या ने फिल्म के बाल कलाकार पार्थो (स्टेनली) और अन्य बच्चों की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि उन्हें कभी नहीं पता होता था कि बच्चे अगले पल क्या करेंगे, इसलिए उन्हें बस ‘रिएक्ट’ करना होता था। यह फिल्म उनके करियर की सबसे खास फिल्मों में से एक है क्योंकि इसमें काम करना किसी काम जैसा नहीं, बल्कि बचपन को दोबारा जीने जैसा था।
दिव्या दत्ता की ये बातें याद दिलाती हैं कि एक अच्छी फिल्म बनाने के लिए करोड़ों के बजट से ज़्यादा एक अच्छी नीयत और सादगी की ज़रूरत होती है। ‘स्टेनली का डब्बा’ आज भी अपनी उसी सादगी के कारण दर्शकों के दिलों में ज़िंदा है।
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