आज विक्रांत मैसी बॉलीवुड के उन चमकते सितारों में से एक हैं, जिनकी एक्टिंग का लोहा हर कोई मानता है। लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने का रास्ता उनके लिए आसान नहीं था। हाल ही में अपनी पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए विक्रांत ने बताया कि एक दौर ऐसा भी था जब उन्होंने कड़ा संघर्ष किया और कई बार उन्हें सिर्फ पारले-जी बिस्किट और पानी पीकर अपना दिन गुजारना पड़ा।
विक्रांत ने साझा किया कि जब वह केवल 16 साल के थे, तब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। अपनी पढ़ाई जारी रखने और घर की मदद करने के लिए उन्होंने कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। वे मुंबई की लोकल ट्रेनों में धक्के खाते हुए एक साथ दो-दो नौकरियां करते थे और दिन में लगभग 16-16 घंटे काम करते थे।
एक्टर ने बताया कि उन दिनों उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे बाहर जाकर भरपेट खाना खा सकें। अक्सर चाय और नाश्ते के पैसे बचाने के लिए वे अपनी जेब में पारले-जी का पैकेट रखते थे। जब भी भूख लगती, वे बिस्किट खाते और पानी पीकर फिर से काम पर लग जाते।
विक्रांत का कहना है कि उनके असल जीवन के इन संघर्षों ने ही उन्हें ’12th फेल’ जैसी फिल्मों में मनोज कुमार शर्मा के किरदार को बारीकी से निभाने में मदद की। उन्होंने बताया कि असफलता और गरीबी का डर इंसान को बहुत कुछ सिखा देता है।
आज विक्रांत के पास फिल्मों की कतार है और वे एक सफल अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं, लेकिन वे अपने उन संघर्ष के दिनों को कभी नहीं भूलते। उनकी यह कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर मायानगरी मुंबई आते हैं।
मुंबई जैसे शहर में बिना किसी गॉडफादर के अपनी जगह बनाना कितना कठिन होता है, इस पर बात करते हुए विक्रांत भावुक हो गए। उन्होंने याद किया कि कैसे वह वर्सोवा से लेकर अंधेरी तक ऑडिशन देने के लिए मीलों पैदल चलते थे ताकि बस या रिक्शे के कुछ पैसे बचा सकें। “वह पारले-जी का पैकेट सिर्फ एक बिस्कुट नहीं था, वह मेरा सहारा था,” विक्रांत ने मुस्कुराते हुए कहा। उनके अनुसार, उन संघर्षों ने उन्हें जमीन से जुड़े रहना सिखाया और आज जब वे लग्जरी कारों में चलते हैं, तब भी उन्हें अपनी जड़ों का अहसास रहता है।
एक वक्त था जब विक्रांत के पास घर का किराया देने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। उन्होंने खुलासा किया कि कई बार उन्हें इस बात का डर सताता था कि अगर काम नहीं मिला तो वे शहर में टिक नहीं पाएंगे। लेकिन उनकी मेहनत और खुद पर विश्वास ने उन्हें हार नहीं मानने दी। आज जब वह फिल्मफेयर जैसे बड़े मंचों पर खड़े होकर अवॉर्ड लेते हैं, तो उनके दिमाग में वही 16 साल का लड़का होता है जो पारले-जी खाकर एक बेहतर भविष्य के सपने देख रहा था।
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