भारतीय सिनेमा के दो सबसे बड़े स्तंभ, शाहरुख खान और आमिर खान, ने एक समय पर एक ऐसी बात कही थी जिसने फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। अक्सर हमें लगता है कि बॉलीवुड फिल्में पूरा देश देखता है, लेकिन इन दोनों सुपरस्टार्स के मुताबिक, हकीकत कुछ और ही है।
आमिर खान ने कई इंटरव्यूज में यह बात उठाई है कि भारत की इतनी बड़ी आबादी (लगभग 140 करोड़) होने के बावजूद, हमारी फिल्मों की पहुंच बहुत सीमित है। उनका और शाहरुख का मानना है कि भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 2 से 3 प्रतिशत हिस्सा ही सिनेमाघरों तक जाकर फिल्में देखता है।
इस बात के पीछे के कुछ मुख्य कारण और उनके विचार यहाँ दिए गए हैं।
भारत के बड़े शहरों में तो मल्टीप्लेक्स हैं, लेकिन छोटे गांवों और कस्बों में आज भी सिनेमाघरों की भारी कमी है। एक आम आदमी के लिए परिवार के साथ मॉल में जाकर फिल्म देखना काफी महंगा सौदा साबित होता है। कई फिल्में केवल शहरी दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, जिससे ग्रामीण भारत उनसे जुड़ नहीं पाता।
जब शाहरुख खान कहते हैं कि “सिर्फ 2% लोग हमें देखते हैं”, तो उनका मतलब अपनी लोकप्रियता कम बताना नहीं होता। बल्कि, वह उस मार्केट की क्षमता की बात कर रहे होते हैं जो अभी भी अछूता है। अगर अभी सिर्फ 2% लोग फिल्म देख रहे हैं और फिल्में 500-1000 करोड़ का बिजनेस कर रही हैं।
तो जिस दिन यह आंकड़ा बढ़कर 10% या 20% हो जाएगा, उस दिन भारतीय सिनेमा पूरी दुनिया पर राज करेगा। यह बयान फिल्म मेकर्स के लिए एक चेतावनी भी है कि उन्हें ऐसी फिल्में बनानी चाहिए जो भारत के हर कोने तक पहुँच सकें।
हालांकि, अब OTT प्लेटफॉर्म्स (Netflix, Amazon Prime, YouTube) के आने से यह दायरा थोड़ा बढ़ा है। अब मोबाइल के जरिए फिल्में उन जगहों तक भी पहुँच रही हैं जहाँ थिएटर नहीं हैं। फिर भी, बड़े पर्दे का जादू अभी भी उसी 2-3% की सीमा में फंसा हुआ है।
शाहरुख और आमिर का यह नजरिया हमें यह समझाता है कि अभी भी बहुत काम करना बाकी है। हमें सिनेमा को और सस्ता, सुलभ और हर भारतीय की पहुंच में लाना होगा।
अगर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री किसी तरह इस पहुंच को 2% से बढ़ाकर 10% भी कर लेती है, तो फिल्मों की कमाई का आंकड़ा कल्पना से परे होगा। आमिर खान का विजन हमेशा से सिनेमा को डेमोक्रेटाइज करने का रहा है, यानी हर तबके तक फिल्म पहुंचाना। वहीं शाहरुख खान अक्सर तकनीक और वीएफएक्स (VFX) की बात करते हैं ताकि भारतीय फिल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कर सकें। इन दोनों दिग्गजों की चिंता जायज है—क्योंकि जिस दिन भारत का हर नागरिक सिनेमा से जुड़ेगा, उस दिन बॉलीवुड सही मायने में ‘ग्लोबल’ बनेगा।
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